आन्दोलन-बाबा-अन्ना व क्रांतिकारी
आज के भारतीय राजनितिक परिदृश्य में लगभग सभी
जगह पर करीब करीब सभी राष्ट्रीय राजनितिक पार्टियों से आम जनता, मध्यम
वर्ग, किसान व मजदुर वर्ग का मोहभंग हो चूका हैं तो जो लोग व्यवस्था में
व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन की बात करते हैं उनके लिये सबसे गंभीर
संकट हैं. यह स्वरूप तथा परिघटना रातो रात भी इस रूप में नहीं प्रकट हुयी
हैं. लगता हैं की ये 'क्रांतिकारी' देश व काल की वस्तुगत परिस्थितियों का
सामयिक व प्रासंगिक परिवेश के अनुकूल विश्लेषण करने में असफल रहें हैं.आज जब इस राजनितिक शून्यता को 'नए' बाबा रामदेव व अन्ना हजारे तथा इनके समर्थकों ने (चाहे किसी के सहयोग व सरंक्षण में ही सही ) एक नए तरह के आन्दोलन में बदल दिया हैं तब केवल यह 'क्रांतिकारी' तबका व उनके संगठन अब इसका फोरी तोर पर विश्लेषण कर रहें हैं. अब यही लोग इस अवस्था में भारतीय राजनीति के मौलिक अन्तर्विरोधो के रहते ना तो इस आन्दोलन को कोई नई दिशा दे सकते व ना ही अपनी कोई सार्थक भूमिका निभा सकते. विडंबना यह भी देखिये कि इन मुद्दों का केवल ये समर्थन ही कर सकते हैं और बस मूकदर्शक बने रहें ! यह इस बात का द्योतक हैं यह 'क्रांतिकारियों' वर्ग भारतीय समाज व राजनीति के मौलिक अन्तर्विरोधो को समजने में ना केवल असफल रहा बल्कि अपने राजनितिक लक्ष्य की भी सही दिशा नहीं पहचान पाया. शायद 'आजादी' के बाद देश व इन 'क्रांतिकारियों' के लिये यह सबसे कठिन समय हैं.
१.बाबा रामदेव एक समय में बायसकल पर बैठकर च्यवनप्राश बेचते थे तथा इस व्यवस्था की अनेक कठिनाई के दौर से गुजरते हुवे लगभग ८ या ९ वर्ष पहले स्थापित हुवे थे. इनकी कई गलतियों रही होगी व कठिनाई भी पर इन 'क्रांतिकारियों' को उनकी दवाइयों में 'मानव' हड्डियां तो दिख गई मगर सेकडों रूपये की पश्चिम कि दवा जब भारत में लाखों रूपये में एक षडयंत्र के द्वारा बेचीं जाती हैं तो नहीं दिखती !
मुख्य बात जिसे में इस पोस्ट के मध्यम से उठाना चाहता हूँ वह यह हैं कि बाबा व अन्ना जेसे कई लोग इस देश में ग्रासरूट पर इस समाज के विकेन्द्रित ढांचे में शानदार कार्य कर रहें हैं पर उनकी तरफ इन क्रन्तिकारी का ध्यान ही नहीं जाता या जानबूझ कर ऐसे लोगों को अनसुना कर दिया जाता हैं. रामदेव जेसे व्यक्तियों का ज्ञान व ध्यान 'क्रांतिकारियों' को पिछड़ा लगता हैं. इससे यह बात प्रमाणित होती हें कि यह क्रन्तिकारी वर्ग भारतीय समाज, परिवेश, ज्ञान, विचार आदि के प्रति पूर्वाग्रह रखता हैं. अगर नहीं तो अन्ना व बाबा जेसे कई लोग इन ''जनसेवको'' के साथ होते ! अब ये लोग रोना रोते हैं की बाबा संघ का आदमी हैं. बाबा संघ के साथ हो या ना हो वे राजनीति के प्रति तटस्थ तो नहीं हैं रह सकते. बाबा तो फिर क्या इनका( क्रन्तिकारियों का) इंतजार करता की कब आये ये लोग व कब मुझे संबल मिले?
२. दुसरा उदहारण अन्ना अजारे का हैं. इस इंसान ने भी अपनी फौज की नौकरी के बाद ताउम्र जनता की सेवा की हैं. आज जिस मुकाम पर ये हैं अगर हम इस पर अधिक बात ना भी करे तो अन्ना जी लगभग २ वर्ष पहले तो राजनीति के हाशिए पर ही थे ! हाँ यह जरुर कहा जा जा सकता हैं की वे लगभग १५ वर्षों से पहले ही समाज में स्थापित हो चुके थे. भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक लामबंदी करने के लिये इन्हें कैसे व क्यों तलाशा गया व एक आन्दोलन का नेतृत्व प्रदान किया गया इन सब बातों कि पृष्ठभूमि पर यह पोस्ट नहीं लिखी जा रही हैं. हम कहना यही चाहते हैं की भारत के समाज में अनेक लोग विभिन्न क्षेत्रो में जबरदस्त ईमानदारी से कार्य कर रहें हैं तथा यही लोग समाज, जनता व सरकारों से अपने कार्य का लोहा भी मनवाते हैं. इनमे से अधिकंश के नहीं तो कइयों के नाम तारीफे के काबिल होते हैं. सवाल यह पैदा होता हैं कि आखिर भारत का वह वर्ग जो परिवर्तन व क्रन्तिकारी बदलाव कि बात करता हैं उसकि नजरों में आखिर ऐसे लोग ध्यान में क्यों नहीं आते ? इनसे संपर्क क्यों नहीं साधा जाता? आखिर परिवर्तनकारी व क्रन्तिकारी वर्ग समाज के मूल सरोकारों का देश व काल कि पृष्टभूमि में आंकलन क्यों नहीं करते हैं?
अतः यह वर्ग समाज कि मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाता जिसके परिणामस्वरूप इन आंदोलनों से या द्वारा अपने आप को हाशिए पर धकेल दिया हुवा पाता हैं.
हमारा कहना हैं की ये क्रांतिकारी आखिर इन्हें (जमीन से जुड़े सामाजिक व राजनैतिक (व्यक्ति ) क्यों नहीं देख पाते? आखिर इन्होने सत्य को देखने का कौनसा चश्मा पहन रखा हैं?
हें क्रांतिकारियों ! समय ना तो किसी को माफ़ करता व ना ही किसी से रुकता ! यह प्रकृति का सत्य हैं.
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