Wednesday, August 15, 2012

दो सन्यासी : सत्ता, सियासत, साजिश व रणनीति

  
 दो सन्यासी : सत्ता, सियासत, साजिश व रणनीति
अन्ना व बाबा के आंदोलन : अन्ना हज़ारे सिविल सोसाइटी के आज के दिन कर्ताधर्ता है, जिनके पीछे NGO व RSS का साथ होना बताया जाता है, तो बाबा रामदेव 'भारत स्वाभिमान अभियान' के मुखिया है व उनके पीछे भी RSS व अनेक संप्रदायों के पंथ गुरुओ का साथ है। दोनों के साथ उच्च माध्यम वर्ग व मध्यर्ग का साथ हें। मीडिया ने इन आन्दोलमों की इतनी तवाजों दी जो की इससे पहले शायद ही किसी को मिली हो । आखिर क्यों ? आखिर लंबे समय से लटके लोकपाल बिल को अचानक सरकार ने क्यों मुख्य धारा की राजनीति में लाने की रणनीति तय की ? ऐसी कोन सी परिस्थीतियाँ बनी जिससे सरकार ने सियासत का जनता के विरुद्ध इस्तेमाल करने की पुनः कोशिश की ? अब इस आंदोलन की दिशा भी क्या होगी तथा यह आंदोलन वास्तव में किन आधारभूत परिवेश से पेदा हुवा ? इसके मुख्य किरदार (सरकार, CS, IAC, BSA, NGO,NAC, former bureaucrat,Media and Middle Class) जो जनता के सामने दिखतें हें के पीछे भी किसी का निहित स्वार्थ रहा हें क्या ? आइये इन सभी मूढ़ो के साथ इसका विश्लेषण करने की कोशिश करें ।
वेसे तो अन्ना व बाबा के द्वारा भारत के जनमानस में भ्रष्टाचार व विदेशों में जमा भारतीय काले धन के प्रति आक्रोश व असंतोष को आधार बनाकर पिछले लगभग 1 वर्ष से भी ज्यादा समय से आंदोलन किया जा रहा हें । इन दोनों शख्सियते ने सारे राजनेतिक दलों को भी इस हालत के लिए जिम्मेदार माना हें । इस आंदोलन को सहानुभूति तो ज्यादा थी, मगर इसके पीछे मध्यम वर्ग व जनसंचार माध्यमो के साधनो द्वारा इस आंदोलन को दी गयी विशेष तवजों के पीछे की सच्चाई पर भी नजर दोड़ावें । सामयिक रूप से इस पर सरकार की कार्यनीति तथा रणनीति व विपक्ष के रवैये के बारे में भी बात करें। हम इस के द्वारा यह भी पड़ताल करेंगे की किन शक्तियों के कारण भारत की साधारण व मेहनतकश अवाम को ये दुर्दिन दिन देखनों को मिल रहें हें ।
बाबा रामदेव ने आखिर आज 12.6.11 को सुबह 11 बजे श्री श्री रविशंकर के हाथों आमरण अनशन समाप्त कर दिया ।
अनशन खत्म होने के एक दिन पहले अन्ना हजारे का कहना था कि बाबा रामदेव को आंदोलन चलाना नहीं आता। अग्निवेश ने कहा की निबू पानी पीने से उनका अनशन टूट गया। विरप्पा मोइली ने कहा कि केन्द्र सरकार कि तरफ से कोई बात नहीं कर रहा व डिग्गी कहतेंथे कि उनको उठाने कोई नहीं जाने वाला।बाबा द्वारा सशत्र सेना कि घोषणा करने के बाद संघ को तो काटे तो खून नहीं !भाजपा हाथ मलते रहेगी। जरा लोकपाल गठित करने के आंदोलन की पर्श्स्तभूमि देखे। सितंबर 2010 से बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार व विदेशों मे जमा काले धन को पुनः भारत मे लाने के लिए देश व्यापी 'राष्ट्रीय स्वाभिमान यात्रा' शुरू की ,जिसमे बाबा ने करोड़ो लोगो तक इस मुद्दे को ले जाकर योग के माध्यम से अपना संदेश पहुंचाया व उन्हे उन ही के अभियान से जोड़ा।

बाबा रामदेव ने स्पष्ट तो पहले किया था कि उनमें कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है और न ही एक राजनीतिक पार्टी शुरू करने में दिलचस्पी है। उन्होने कहा था कि उन्हें लगता है की यह उनका अनिवार्य कर्तव्य है कि वे योग को लोकप्रिय बनाने अलावा सामाजिक और राजनीतिक अस्पष्टता में सुधार कर इस देश को मजबूत करने में सहायता कर सकतें हें ।एक बार उन्होने जरूर कहा था की वे राजनीतिक पार्टी भी बनाएंगे । वह अपने योग शिविरों के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों उठाते रहें । उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों में से अधिकांश भारत के शासन की नीतियों में एक कठोर परिवर्तन की मांग का आग्रह करतें हें। 2011 फरवरी में उन्होंने काले धन के उन्मूलन के लिए 6 मुख्य मांगे रखी। सरकार द्वार उक्त मुद्दों पर उचित सख्त कदम नहीं उठाने व लगातार पर्दाफ़ाश हो रहे नए नए घोटालों ने अंत: उन्हे आन्दोलन को अमली जामा पहनाने कि ओर विवश किया। उधर रामदेव के तेवर व उनकी संगठनिक क्षमता देख कर सरकार बुरी तरह सी हिल गयी वंही मीडिया नित नए घोटालों का पर्दाफ़ाश कर रहा था व लगातार बेइजत होती सरकार अपने गठबंधन धर्म में फसी थी। सरकार पर लगभग सारी जांच एजेंसियों को अपने दिशा निर्देश में चलाने के पुख्ता आरोप लग रहे थे । इसी दौरान न्यायपालिका ने सरकार पर पारदर्शिता बरतने व अपने नियंत्रण में जांच की कार्यवाहियाँ करने के निर्देश दिये। प्रकरण से प्रकरण व घोटाले दर घोटाले मे सरकार बुरी तरह फसती नजर आयी । उधर विभाजित विपक्ष भी सरकार पर प्रहार कर रहा था । यंहा ये भी उल्लेखनीय हे की संसद का एक सत्र तो पूरा 2G घोटाले कि भेंट चढ गया । आखिर में सरकार JPC बनाने पर राज़ी हुईं । इतना होने के बावजूद सरकार की भ्रष्टाचार पर निरन्तर किरकिरी हो रही थी ।
इस दौर में एक ओर महत्वपूर्ण घटना तीव्र गति से घटित हुईं। उसकी पृष्ठभूमि देखे बगैर हम सही विश्लेषण शायद नहीं कर पांवे, ज़रा उसके ऊपर भी संक्षिप्त में दृष्टि डालें ।
सत्ता व सियासत :बाबा रामदेव का आंदोलन 1990 के दशक के बाद साम्राज्यवाद के फासिस्ट सरपरस्ती में देसी फासीवादी पूंजीवाद के बीच बढ़ते सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सान्स्क्रतिक अंतर्विरोध व उनके साथ भारत के आवाम की बढ़ती खाई को इंगित करता हे। हालांकि इस आंदोलन का प्रतिनिधित्व नवोदित मीडिया से संचालित व पौराणिक धार्मिक आस्था से जुड़े व स्वामी रामदेव जी से प्रेरित मधयम वर्ग का एक तबका कर रहा था, तो भी इस आंदोलन की महत्ता कदापि कम नहीं हो सकती। सभी समुदाय में जितनी उत्सुकता व आशा इस आंदोलन की थी व अब भी है जो शायद बड़े व तीव्र अभियान के रूप में कम ही रही है।इस आंदोलन के पीछे मुख्य भूमिका तो बाबा रामदेव की ही है, जिनहोने निरंतर आध्यात्म व देश की अस्मिता को विदेशी मे जमा काला धन को वापस लाने के साथ जोड़कर निरंतर कई वर्षो से जन जागरण का अभियान शुरू किया व देशी पूंजीपति के फससिस्ट चहरे को बेनकाब किया। यह इस आंदोलन की बहुत बड़ी देन है तथा अब जो भी जनता के बड़े आंदोलन होंगे उन सबको इन परिस्थितियों से निपटने की कार्यनीति व रणनीति को ध्यान में रखना होगा।
भास्कर के समाज पर । भ्रष्टाचार पूंजीवाद का ग्रीस है व बिना इसके पूंजीवाद चल ही नहीं सकता। जनता का ध्यान भ्रष्टाचार के स्थायी समाधान की बजाय लोकपाल कि तरफ मोड़ने में देशी व विदेशी पूंजी का अंतर्विरोध व उनकी राजनीतिक पार्टियों कि सत्ता पर काबिज होने कि लड़ाई ही है। आखिर लंबे समय से लटके लोकपाल बिल को अचानक सरकार ने क्यों मुख्य धारा की राजनीति में लाने की रणनीति तय की ? ऐसी कोन सी परिस्थीतियाँ बनी जिससे सरकार ने सियासत का जनता के विरुद्ध इस्तेमाल करने की पुनः कोशिश की ? अब इस आंदोलन की दिशा भी क्या होगी तथा यह आंदोलन वास्तव में किन आधारभूत परिवेश से पेदा हुवा ? इसके मुख्य किरदार (सरकार, CS, IAC, BSA, NGO,NAC, former bureaucrat,Media and Middle Class) जो जनता के सामने दिखतें हें के पीछे भी किसी का निहित स्वार्थ रहा हें क्या ? सरकार पर लोकपाल लाये जाने का दबाव तब तीव्र था क्योंकि मीडिया ने , जो कि देसी पूंजीपति वर्ग का हित देखता है व उसी के नियंत्रण में है।भ्रष्टाचार के स्थायी समाधान को व्यवस्था परिवर्तन कि लड़ाई कि बजाय फोरी तौर पर लोकपाल कि तरफ मोड दिया था। मीडिया अपने अंतविरोध के चलते नित नए घोटालो का पर्दाफाश कर रहा था। न्यायपालिका का शिकंजा कसता जा रहा था, न्यायपालिका व विपक्ष लगातार सरकार को कठगड़े में खड़ा कर रहे थे व भ्रष्टाचार पर जनता में रोष तथा आक्रोश बहुत बढ़ चुका था। इसी अवस्था व अपने चरित्र के अनुरूप सरकार कि तो मंशा न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने कि ही थी, मगर उसने अपनी एक रणनीति के तहत ड्राफ्ट तेयार किया व न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे से बहरा कर दिया।
के मध्य इस आंदोलन को जितनी सार्थकता इस दौर में एक और महत्वपूर्ण घटना तीव्र गति से घटित हुई। उसकी प्रष्टभूमि को देखे बगैर हम बाबा रामदेव के आंदोलन का शायद सही विश्लेषण न कर पावें, जरा उसके ऊपर भी क्षंक्षिप्त में ध्र्ष्टी डाले।
सरकार की चाल व रणनीति :
सरकार कि न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे से बाहर करने के पीछे एक रणनीति अवश्य थी, क्योंकि सरकार इस मुधे को दो तरफा इस्तेमाल करके भुनाना चाहती थी। दुनिया भर में NGO, जो की साम्राज्यवादी पूंजी से चलते हें व उनकी साम्राज्यवादी राजनीति के तहत एक जन विरोधी व फासीवाद की राजनीति करतें हें । हर देश में इनकी भूमिका राजनेतिक पार्टियों की खिलाफत की रही हें । जंहा भी इनको मोका मिले ये पतनशील व असभ्य संस्कृति का परतिनिधित्व करतें हें । सरकार ने जनता में बढ़ते हुवे राजनेतिक पार्टियों को किनारे करने की रणनीति बनाई । NGO के सामने लाचारी व बेबसी व्यक्त कि की सरकार कि न्यायपालिका लोकपाल के दायरे से बाहर इसलिए रख रही हें की इसे विपक्ष शामिल करना नहीं चाहता । संभव था तब हो सकता हें कि NGO के लोग इस मुद्दे पर अड़ गए या फिर सरकार ने इन्हे भड्कया या फिर सरकार व इनके बीच विपक्ष को खत्म करने ( विशेष कर भाजपा को ) का कोई गुप्त समझोता हुवा हो, कुछ कहना अभी जल्दबाजी हें । जो भी हो यह तय हें की चोथी कोई संभावना नहीं हो सकती । यह डर सरकार में था कि रामदेवजी कंही बड़ा आंदोलन नहीं कर बेठे, जो कि हमारे वश में ही न हो, क्योंकि उनका मुख्य मुधा भारतीयों द्वारा जमा विदेश काले धन को वापस लाने का रहा हें जो सरकार के गले में फंदे जेसा हें।
NGO निर्देशित व गठित Civil Society का अभियान India Against Corruption का आंदोलन नही चल रहा था जिसने CWG व केई अन्य परकरणों को उजागर किया था व उनका मुख्य मुधा भ्रष्टाचार हें। इन लोग में कोई एसी शख्सियत नहीं थी जो गांधी कि तरह का चेहरा हो, जिसके ऊपर जनता ज्यादा भरोसा करे व लोकप्रिय भी हो। रामदेवजी से अलग चल रहे Civil Society के अभियान India Against Corruption व NAC के माध्यम व बिना उनके सहयोग से भी कई बार उन्होने सरकार के सामने भ्रष्टाचार के मामले रखे व कारगर लोकपाल कि वकालत। सरकार व Civil Society के अभियान (India Against Corruption) के मध्य NAC ने मुख्य भूमिका निभाई तथा रामदेवजी के आंदोलन कि आहट पाकर 7.3.11 को पीएम ने अन्ना हज़ारे को बातचीत के लिए बुलाया, यह इन दोनों कि गुप्त बेठक थी व इसी बेठक ने सारे आंदोलन कि रूपरेखा तय कर दी थी । बाद में अन्ना हज़ारे कि चिठी व उनका अनशन का अलान हुवा । इस आंदोलन में हालांकि बाबा रामदेव को भी ले लिया था क्योंकि रामदेव भी (India Against Corruption) के साथ जुड़े हौवे थे । आंदोलन जबर्दस्त तरीके से चला । इसके किरदार दिखने मे तो Civil Society व (India Against Corruption) थे, पर पीछे थे NGO व NAC। चालक कि भूमिका थी पिछले लगभग 20 वर्षो से उभरा मध्यम वर्ग, मीडिया व उनका पूंजीपति वर्ग । इस आंदोलन को सरकार द्वारा पूरा समर्थन प्राप्त था । अंत: इस को कार्यक्रम बस प्रययोजित ही कहना उचित लगता हें। हालांकि स्वामी रामदेव को 2011 में 'भारतीय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन' के साथ संबद्ध किया गया था मगर उन्हे चालाकी से संजोते से अलग रखा गया। बाबा ने इस टीस को सहन कर लिया मगर यह जरूर कहा की भूषण पिता व पुत्र दोनों को शामिल करना उचित नहीं हें। मगर उन्होनों समर्थन भी दिया और वे जन लोकपाल आंदोलन में भी शामिल रहें । इस आंदोलन की समाप्ती पर जो Civil Society व (India Against Corruption) की ड्राफ्टिंग कमेटी बनी उसका मुख्य मुधा लंबी रस्साकसी व जद्दोजहद के बाद जो निकाल रहा हे वो यह हें की Civil Society PM व न्यायपालिका को लोकपाल के अधीन करना चाहती हें । कांग्रेस भी तो वही चाहती हें । यह एक सरकार की रणनीति का ही एक अंग हें जिससे जनता का भ्रष्टाचार सहित अन्य मुधों से ध्यान हट जाय व एक PM व CJI को लोकपाल के दायरे में लेने का दबाव बनाया जाय । सरकार उसका लगातार विरोध करे ओर वही हो रहा हें । अगर सरकार खुद अपने प्रस्ताव से ही पीछे हट रही हें यह कितना अलोकतांत्रिक हें यह ढिंढोरा ड्राफ्टिंग कमेटी पीट रही हें ।
NGO निर्देशित व गठित Civil Society का अभियान India Against Corruption का आंदोलन नही चल रहा था जिसने CWG व केई अन्य परकरणों को उजागर किया था व उनका मुख्य मुधा भ्रष्टाचार हें। इन लोग में कोई एसी शख्सियत नहीं थी जो गांधी कि तरह का चेहरा हो, जिसके ऊपर जनता ज्यादा भरोसा करे व लोकप्रिय भी हो। रामदेवजी से अलग चल रहे Civil Society के अभियान India Against Corruption व NAC के माध्यम व बिना उनके सहयोग से भी कई बार उन्होने सरकार के सामने भ्रष्टाचार के मामले रखे व कारगर लोकपाल कि वकालत। सरकार व Civil Society के अभियान (India Against Corruption) के मध्य NAC ने मुख्य भूमिका निभाई तथा रामदेवजी के आंदोलन कि आहट पाकर 7.3.11 को पीएम ने अन्ना हज़ारे को बातचीत के लिए बुलाया, यह इन दोनों कि गुप्त बेठक थी व इसी बेठक ने सारे आंदोलन कि रूपरेखा तय कर दी थी । बाद में अन्ना हज़ारे कि चिठी व उनका अनशन का अलान हुवा । इस आंदोलन में हालांकि बाबा रामदेव को भी ले लिया था क्योंकि रामदेव भी (India Against Corruption) के साथ जुड़े हौवे थे । आंदोलन जबर्दस्त तरीके से चला । इसके किरदार दिखने मे तो Civil Society व (India Against Corruption) थे, पर पीछे थे NGO व NAC। चालक कि भूमिका थी पिछले लगभग 20 वर्षो से उभरा मध्यम वर्ग, मीडिया व उनका पूंजीपति वर्ग । इस आंदोलन को सरकार द्वारा पूरा समर्थन प्राप्त था । अंत: इस को कार्यक्रम बस प्रययोजित ही कहना उचित लगता हें। हालांकि स्वामी रामदेव को 2011 में 'भारतीय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन' के साथ संबद्ध किया गया था मगर उन्हे चालाकी से संजोते से अलग रखा गया। बाबा ने इस टीस को सहन कर लिया मगर यह जरूर कहा की भूषण पिता व पुत्र दोनों को शामिल करना उचित नहीं हें। मगर उन्होनों समर्थन भी दिया और वे जन लोकपाल आंदोलन में भी शामिल रहें । इस आंदोलन की समाप्ती पर जो Civil Society व (India Against Corruption) की ड्राफ्टिंग कमेटी बनी उसका मुख्य मुधा लंबी रस्साकसी व जद्दोजहद के बाद जो निकाल रहा हे वो यह हें की Civil Society PM व न्यायपालिका को लोकपाल के अधीन करना चाहती हें । कांग्रेस भी तो वही चाहती हें । यह एक सरकार की रणनीति का ही एक अंग हें जिससे जनता का भ्रष्टाचार सहित अन्य मुधों से ध्यान हट जाय व एक PM व CJI को लोकपाल के दायरे में लेने का दबाव बनाया जाय । सरकार उसका लगातार विरोध करे ओर वही हो रहा हें । अगर सरकार खुद अपने प्रस्ताव से ही पीछे हट रही हें यह कितना अलोकतांत्रिक हें यह ढिंढोरा ड्राफ्टिंग कमेटी पीट रही हें । लाख टके का एक सवाल की आखिर फिर सारा नाटक क्यों खड़ा किया गया था ? इधर लोकपाल पर चर्चा चल रही हें व सरकार तथा ड्राफ्ट कमेटी के मध्य नए नए संशय व विवाद खड़े किए जा रहे हें । इस मूढ़े पर पूरी चर्चा करने से पहले रामदेव के आंदोलन पर भी बात की जय ।
साजिश की रणनीति ? उधर बाबा रामदेव के द्वारा विशाल अनशन करने का आह्वान कर दिया गया । उन्होने घोषणा कि की वे 4.6.11 से अपने समर्थको सहित रामलीला मैदान में अनिश्चित अनशन पर बेठ रहें हें। दुनिया में शायद ही 5 स्टार धरना एसा कभी नहीं लगा हो , वो भी इतना बड़ा, पहली बार लग रहा था । कहा गया कि पर्दे के पीछे तो RSS हे । उनको नक्सलवादियों ने भी समर्थन दिया व हरियाणा की 11 खाँप पंचायतें भी उनके साथ थी ।बाबा रामदेव का संगर्ष बिल्कुल जायज हें की भारत के संविधान के अनुसार काला धन बाहर नहीं जाना चाइए। सारे संसार को यह पता है की भारत सरकार का सबसे ज्यादा काला धन विदेशो बेंकों, विशेष कर स्विस बेंकों, में जमा है। सरकार कहती है की यह धन इतना आसानी से व जल्दी नहीं लाया जा सकता है क्योंकि इन बेंकों के साथ हमारे समझोते है। जनता पुछती है की जब संविधान ही आपको एसे समझोते करने की इजाजत नहीं देता, तो सरकारों ने एसे गैर संवैधानिक समझोते क्यूँ किए ।
सरकार की साजिश : अनशन सुरू होने के बाद ही एक घटना घटी या यों कहें की एक साजिस का खुलाशा हुवा जिसमे सरकार कि तरफ से 4.6.11 की शाम को सरकार के प्रवक्ता ने कहा रामदेव ने तो समझौता 3.6.11 को ही कर लिया था व वे अब उसकी पालना नहीं कर रहें इसलिए हम इसे मीडिया के सामने रखते हें । अब तक यह गुप्त था । उन्होने यह भी कहा कि रामदेव कि तरफ से उतर मिलनेवाला था जो नहीं आने के कारण हम इसे सार्वजनिक कर रहें । सवाल उठता हें समझौता किसे कहते हें ? क्या यह एक पक्षीय होता हें । अगर नहीं तो यह कैसा समझौता ? बात यह थी कि की बाबा की सहमति से उनके सहयोगी (आचार्य बलकिशन ) ने एक चिट्ठी लिखी, उस चिट्ठी में कुछ भी ऐसा नहीं लिखा था जिसका कि सरकार बेजा इस्तेमाल करे ! बालाकृशन ने बाबा की तरफ से पत्र दिया की इन मुधों पर सरकार से सहमति हें व इस संबंध मे सरकार अपनी सहमति दे देगी। उसमे साफ़ कहा गया था कि आप मांग मानने का पत्र सौपेंगे, फिर बाबा अनशन खत्म करने की घोषणा करेंगे । 2 दिन का तप चलेगा, फिर सब चले जायेगे । सरकार की तरफ से कोई प्रति उतर नहीं आया। सरकार ने बात करने की बजाय बाबा को ब्लाकमेल करने की कोशिश की । दरअसल ये कांग्रेस की आपसी कलह थी, जिसके चलते सिब्बल ने बाबा को बेइज्जत करने के लिए पत्र सामने किया कि पहले ही समझौता हो चुका था, कारवाई तो पहले ही तय हो गई थी । यह घटना कांग्रेस कि दो लोबी के बीच टकराव का नतीजा थी । माकपा ने भी इस तथाकथित समझोते की आलोचना की । अनेक ने कहा की पहले ही बंद कमरे में बात हो चुकी थी ! हाँ बातचीत तो बंद कमरे मे ही होगी, यही परंपरा हे राजसत्ता की, इसमे बुरा क्या हें । यह कोई बाबा का पर्वचन थोड़े ही था, जो वे सभी के सामने करते ? सरकार व अन्य सभी को पता था बाबा सिर्फ योगा करने के लिये दिली में नहीं आए थे व न ही जनता केवल योगा के लिए आयी थी ! वे घोषित रूप से अनशन करने के के लिए ही आए थे । बाबा ने कम से कम सितंबर 2010 से तो सन्यासी की तरह से योगा करने के नाम पर ही सही, पर विदेशी काले धन के खिलाफ जनता को शहर दर शहर जाकर के जगाया था ! अब ये कोई कबीरपंथी तो हे नहीं जो बिना पैसे कर सकते हो । सो बाबा ने इसी पूंजीवादी व्यवस्था के अनुसार दान, चंदा, फ़ीस आदि लेकर यहाँ तक पहुंचे हे । इसमे ज्यादा शक हो तो जांच करवा लो । जरूरी थोड़े ही हे उनकी बातों से आप पूरे सहमत हो ! फिर 4.6.11 कि रात को दिली सरकार कि 5000 हजार पुलिस ने सोची समजी रणनीति के तहत छोटे छोटे बच्चों, महिलावों व वर्द्ध लोगो के साथ जनता को घेर कर लाठीचार किया व आँसू गैस के गोले दागे । अनेक लोग घायल हो गए PM ने बेशर्मी भरे तरीके से इसे एक दुर्घटना करार दिया कहा की हमारे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था ! शर्म कि बात हें कि इन लोगो से सरकार इतनी गबरा गई कि थी जो कल ये लोग संसद में घुस जाएंगे ! आखिर सरकार ने इतना जल्दबाजी में निरंकुश व अलोकतांत्रिक तरीका क्यों अपनाया । जायज़ मांग के विरुद्ध लोकतंत्र मे यह बर्बरता किसे स्वीकार होगी ? इस आंदोलन को एक सोची समाजी सजिस के तहत कुचल दिया गया > रामलीला मैदान में हौवा दमन पांडवों के लक्षगढ़ जेसा हो सकता था? सनद रहें पंडाल में अंशुगेस छोड़ने के बाद आग लगी थी । क्या यह सरकार या दिल्ली पुलिस की साजिश नहीं थी। याद करो इस लक्षाग्रह मे 5 पांडव नहीं हजारो की भीड़ थी। क्या हम लोग मुंह देखने लायक हें । दिखाने के तो पहले से ही लायक नहीं हें। क्या इसे सरकार व दिल्ली पुलिस की साजिश नहीं तो और क्या कहें। नादान तो वर्ध काँग्रेस इस लोकतंत्र में है नहीं।
बाबा ने गुप चुप तरीके से ओरत के सफ़ेद कपड़े पहने कर पुलिस से बचने कि कोशिश कि मगर पकारे गए व उन्हे सरकार विमान द्वारा हरिद्वार में पितांजली योग पीठ छोड़ दिया गया । सरकार कि चोतरफ़ा आलोचना हुवी, मगर उस पर कोई असर नहीं था !
बाबा के साथ पहला धोखा : यह तब जब कलयुग के इस दोर में बाबा रामदेव का चीर हरण खुली रामलीला मैदान में हुवा था ! बाबा को पता होना चाहिए ''DHARMA'' युद्ध में जमीन का बहुत महत्व हें । विष्णु अवतार कृष्ण का जीवन पगथली में था अर्थात जब तक वे जमीन से जुड़े रहे तब तक उनको कोई नहीं हरा सका था तथा जब जमीन छूटी तो जंगल में तीर से ही वे ब्रह्म में लिन हो गए । बाबा से जब जमीन छूटी तो घोषणा नहीं हुवी कि अब सबे भूमी गोपाल की । धर्मा युद्ध समय का भी इतना ही महत्व होता हें । 'समय बड़ा बलवान हें समय समय की बात, काबा लूटी गोपियाँ यही अर्जुन यही बाण,' बाबा के हाथ से समय भी घोड़े की रफ्तार से निकल गया ।
बाबा के साथ दूसरा धोखा : बाबा ने हरिद्वार जाकर आरोप लगाया कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के नेताओं का हैं तथा सरकार अध्यादेश इसलिए नहीं लाना चाहती । बाबा ने कहा कि सरकार ने उनके साथ धोखा किया है।। बाबा को यह दूसरा धोखा था । बाबा ने अब बम्ब तो फोड़ दिया आगे क्या करते ! लगता हैं की बाबा कुटिल व धुरत सिब्बल की चाल में फस गए थे जो अभी पूरा सच बोल गए ?

आंदोलन की रात बलप्रयोग बाबा के लिए महत्वपूर्ण क्षण का समय व अवसर था। वही से आंदोलन को दिशा सहानुभती की लहर से मिलती। उन्हे कष्ट को सहन करना चाहिए था। आंदोलन के इस नाजुक मोड पर वही से वे नेत्रत्वकारी शक्ति के रूप में उबरते व करिश्माई दिखते। बाबा ने यह दोनों अवसर गवा दिये क्यूंकी बाबा चुप नहीं रहे व औरत के वेश मे अवतरित होकर अपनी व्यथा कथा सुनाई, मगर किया कुछ नहीं। उन्होने दूसरे दिन ही तुरंत बाद सशस्त्र सेना की घोषणा कर दी। जिसकी फिलहाल तो कोई सार्थकता नहीं हें !
कांग्रेस के हमले व अनशन के लंबे चलने से उनके साथ अनुयायी तो रहे मगर कांग्रेस द्वारा जांच की धमकी देने के पश्चात व उन्ही के द्वारा अपनी संपति घोषित करने से जनता में संशय बढ़ा व समर्थन घटा था। वेसे भी बाबा के साथ उच जातियों के माध्यम वर्ग का उनको समर्थन था व दलित व मुस्लिम नाम मात्र के साथ थे । आदिवशी नगण्य थे, अतः इसे जन आंदोलन तो वेसे भी नहीं कहा जा सकता था।
बाबा रामदेव ने आखिर आज 12.6.11 को सुबह 11 बजे श्री श्री रविशंकर के हाथों आमरण अनशन समाप्त कर दिया ।
अनशन खत्म होने के एक दिन पहले अन्ना हजारे का कहना था कि बाबा रामदेव को आंदोलन चलाना नहीं आता। अग्निवेश ने कहा की निबू पानी पीने से उनका अनशन टूट गया। विरप्पा मोइली ने कहा कि केन्द्र सरकार कि तरफ से कोई बात नहीं कर रहा व डिग्गी कहतें थे कि उनको उठाने कोई नहीं जाने वाला। बाबा द्वारा सशत्र सेना कि घोषणा करने के बाद संघ को तो काटे तो खून नहीं ! भाजपा हाथ मलते रह गयी । जरा लोकपाल गठित करने के आंदोलन की पर्श्स्तभूमि देखे। सितंबर 2010 से बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार व विदेशों मे जमा काले धन को पुनः भारत मे लाने के लिए देश व्यापी 'राष्ट्रीय स्वाभिमान यात्रा' शुरू की ,जिसमे बाबा ने करोड़ो लोगो तक इस मुद्दे को ले जाकर योग के माध्यम से अपना संदेश पहुंचाया व उन्हे उन ही के अभियान से जोड़ा।
आखिर दमन व तानाशाही का ज़िम्मेदार कौन?
अब यह मुधा तय करता आंदोलन की दिशा तथा जो रणनीति बनाकर जनता को सड़कों पर उतार देता बाकी दिशा वे आसानी से बना सकते थे । यह लड़ाई कोई भी शुरू कर सकता था ,उस समय जनता सबका स्वागत करती ! पर यह तय हो गया था की अगर आंदोलन सफल होगा तो दिशा जनता ही तय करेगी, बंद कमरों में अब सफलता इस मुधे पर नहीं थी ! घटना शर्मनाक व लोक्तंतर पर हमला थी , विपक्ष को इस मुधे पर भारत बंद का एलान करना चाहिए था सबसे पहले बाबा को ही पहल करनी चाहिए थी, यह उनकी राजनीति के 16 वर्ष की राजनीति कि अग्निपरीक्षा थी ! भाजपा करती हें तो आंदोलन की दिशा बदल जाती व उसका पुनरोदय तय था !पर एसा कुछ भी नहीं हुआ। लगातार अनशन के साथ कार्यक्रम नहीं बना जिससे जनता सड्को पर उतार जाए व कहे की यह अन्याय नहीं चलेगा । अब सरकार जवाब दें के इस सरकार के तीसरे वर्ष मे पहुँचने तक क्या कदम उठाए व अब क्या करने जा रहे हें?
मीडिया में बाबा रामदेव के आंदोलन को लेकर लगा की विभाजन शुरू हो गया था । एक वर्ग जो सांगठनिक ताकत हें, जिसने सबसे पहले समर्थन किया था । अब emergency की आहट को देखते हुवे बाबा के आंदोलन के तरीके से सहमत नहीं दिखा । उसकी आखिर हुंकार भरने की ताकत कन्हा गयी !
अनशन के बाद बाबा कि तबीयत बिगर्ती गयी । शूकरवार कि रात उनका बीपी 80/40 रह गया था जो कि खतरनाक था
बाबा रामदेवजी योगी हें, तपस्वी नहीं, योगी को भोजन के रूप में भोग चाहिए था । उनकी ज़िंदगी का एक दुर्भाग्य हें की उनको 3 वर्ष की आयु से पहले लकवा हो गया था। एसे योगी के लिए लगातार अनशन पर रहना जीवन के लिए जोखिम भरा था ।
कांग्रेस के हमले व अनशन के लंबे चलने से उनके साथ अनुयायी तो रहे मगर कांग्रेस द्वारा जांच की धमकी देने के पश्चात व उन्ही के द्वारा अपनी संपति घोषित करने से जनता में संशय बढ़ा व समर्थन घटा था। वेसे भी बाबा के साथ उच जातियों के माध्यम वर्ग का उनको समर्थन था व दलित व मुस्लिम नाम मात्र के साथ थे । आदिवशी नगण्य थे, अतः इसे जन आंदोलन वेसे भी नहीं कहा जा सकता था।
मैंने इस पोस्ट पर लिखा था कि बाबा से रामलीला मैदान छूटा हें, अब मानो जंग की जमीन छीनी जा चुकी हें। अब पतंजलि तो केवल योग व जड़ीबूटियाँ बेचने का केंद्र हें, अनशन व आंदोलन की जगह नहीं ! आखिर बिना सार्थक परिणाम के अनशन टूटा । अब तेल देखो तिलों कि धार देखों । बाबा अपनी सेना के भरोसे थे !
बाबा रामदेव ने आखिर आज 12.6.11 को सुबह 11 बजे श्री श्री रविशंकर के हाथों आमरण अनशन समाप्त कर दिया ।
अनशन खत्म होने के एक दिन पहले अन्ना हजारे का कहना था कि बाबा रामदेव को आंदोलन चलाना नहीं आता। अग्निवेश ने कहा की निबू पानी पीने से उनका अनशन टूट गया। विरप्पा मोइली ने कहा कि केन्द्र सरकार कि तरफ से कोई बात नहीं कर रहा व डिग्गी कहतें थे कि उनको उठाने कोई नहीं जाने वाला। बाबा द्वारा सशत्र सेना कि घोषणा करने के बाद संघ को तो काटे तो खून नहीं ! भाजपा हाथ मलते रह गयी । जरा लोकपाल गठित करने के आंदोलन की पर्श्स्तभूमि देखे। सितंबर 2010 से बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार व विदेशों मे जमा काले धन को पुनः भारत मे लाने के लिए देश व्यापी 'राष्ट्रीय स्वाभिमान यात्रा' शुरू की ,जिसमे बाबा ने करोड़ो लोगो तक इस मुद्दे को ले जाकर योग के माध्यम से अपना संदेश पहुंचाया व उन्हे उन ही के अभियान से जोड़ा।
सवाल उठता है की ब्रष्टाचार उन्मूलन को व्यवसतह परिवर्तन की लड़ाई से ब्रिटिश हुकूमत के समाप्त होने के 48 वर्ष बाद भी क्यूँ नहीं जोड़ा जा सका । उत्तर भी साफ लगता है की जनता व मेहनतकश वर्ग के पास सामाजिक व सान्स्क्रतिक के रूप से कोई वैकल्पिक सोच व विचारधारा सामने नहीं दिख रही थी , जिसके ऊपर अमल करने से एक क्रांतिकारी जन आंदोलन खड़ा किया जा सके। आखिर वैकल्पिक व्यवस्था क्या हो सकती है? इस हेतु हमें भारतीय आध्यात्म व नवीनतम वैज्ञानिक सोच की तरफ ध्यान देना पड़ेगा, तभी एक सार्थक वैकल्पिक समाज व्यवस्था परिवर्तन का संघर्ष सफल हो सकताहें।
भारतीय समज तर्क पर कम तथा विश्वास व परंपरा में करिश्मा देखता आया है। ये ही उसका मनोविज्ञान है।
आंदोलन की रात बलप्रयोग बाबा के लिए महत्वपूर्ण क्षण का समय व अवसर था। वही से आंदोलन को दिशा सहानुभती की लहर से मिलती। उन्हे कष्ट को सहन करना चाहिए था। आंदोलन के इस नाजुक मोड पर वही से वे नेत्रत्वकारी शक्ति के रूप में उबरते व करिश्माई दिखते। बाबा ने यह दोनों अवसर गवा दिये क्यूंकी बाबा चुप नहीं रहे व औरत के वेश मे अवतरित होकर अपनी व्यथा कथा सुनाई, मगर किया कुछ नहीं। उन्होने दूसरे दिन ही तुरंत बाद सशस्त्र सेना की घोषणा कर दी। जिसकी फिलहाल तो कोई सार्थकता नहीं हें !
अन्ना व बाबा: अन्ना हज़ारे सिविल सोसाइटी के आज के दिन कर्ताधर्ता है, जिनके पीछे NGO व RSS का साथ होना बताया जाता है, तो बाबा रामदेव 'भारत स्वाभिमान अभियान' के मुखिया है व उनके पीछे भी RSS व अनेक संप्रदायों के पंथ गुरुओ का साथ है। आइये इनके द्वारा भारता के जनमानस में भ्रष्टाचार व विदेशों में जमा भारतीय काले धन के प्रति आक्रोश व असंतोष को आधार बनाकर पिछले लगभग 1 वर्ष से भी ज्यादा समय से किए जा रहे आंदोलन पर बात करें। दोनों शख्सियते ने सारे राजनेतिक दलों को भी इस हालत के लिए जिम्मेदार मानतें हें । इस आंदोलन को सहानुभूति तो ज्यादा थी, मगर इसके पीछे मध्यम वर्ग व जनसंचार माध्यमो के साधनो द्वारा इस आंदोलन को दी गयी विशेष तवजों के पीछे की सच्चाई पर भी नजर दोड़ावें । सामयिक रूप से इस पर सरकार की कार्यनीति तथा रणनीति व विपक्ष के रवैये के बारे में भी बात करें।
बाबा एक योगी: बाबा मुख्यतः एक योग गुरु है। हालांकि योग हमारी सामाजिक व आध्यात्मिक व्यवस्था की धरोहर रहा है तथापि आम व्यक्ति के लिए जरूरी कदापि नहीं रहा। इसे साधु , संत, सन्यासी व तपस्वी ही किया करते थे। हालांकि ग्रहस्थ धरम का पालन करने वाले के लिए भी यह त्याज्य नहीं रहा था, बल्कि आदर्श रूप से ही इसे देखा जाता है। यह एक अध्यातम कर्म की उच्च कोटी है ,जिसका विस्तार रूप से यहा उल्लेख करना जरूरी नहीं समझना चाहिए।
बाबा रामदेव का योग मुख्यत उसका मात्र एक भाग है तथा यह उसे मुख्यतः वे बीमारियों के निवारण व बचाव से जोड़ते हैं। बाबा की योग की विचारधारा, कि योग आम आदमी के लिए जरूरी हैं, इस पर लोगों में मतभेद जायज भी हें, यह 'मध्यम वर्ग' को आकर्षित कर सकता हें जो शारीरिक क्षर्म नहीं करता हें। इंसान को इसे 'मध्यम वर्ग' के लिए 'जिम' जैसा मानना चाहिए, जो की गेर उत्पादक हैं। इक व्यक्ति के घर के पास कचरा पड़ा रहता हें, पास में खाली पड़े प्लाट में पानी सड़ रहा हो, उसे अपने पुरषार्थ व क्षर्म से साफ करने की इच्छा नहीं, पर योग, क्योंकि ''सभ्य" लोग कर रह हें, मुजे भी करना हें। यह बीमारी दूर करता हैं। यह मनोविज्ञान अंतत: क्षर्म के प्रीति अवाम व मेहनतकश वर्ग में नफरत ही पेदा करता हें अगर इसे क्षर्म से साफ तोड़ कर देखें तो, जेसे बाबा इसको दिखलातें हें । योग को योग की जगह व तरह ही देखा जाना चाहिए । मेहनत के स्थानापन के रूप में देखना दोनों ( क्षर्म व योग ) के साथ अन्याय हें । जनता, व विशेष कर भारत जेसे क्षर्म प्रधान देश की जनसंख्या, के साथ कतही समयोचित नहीं हें जिस नजरिए से बाबा बाबा इसे पेश करतें । इसको व्यापारिक रूप देने में भी कोई मतभेद नहीं हें क्यों बाजार के बिना तो कोई केसे टीका रह सकता हें पर अंतत: व्यापार के जरिये मेहनत की बाजार की शक्तियों को पूँजीपतियों के हवाले करना अंतर्विरोध व संघर्ष को पेदा करेगा व यह संघर्ष न्यायोचीय, लाजमी, तरकसंगत, स्वाभाविक व जरयरी भी हें । योग को योग के बाजार के दायरे में ही रहना चाहिए, क्योंकि योग क्षर्म से विकशित हुवा हें, न की योग से क्षर्म ।
यह एक शासक वर्ग, जो की 1990 के बाद देसी फासीवादी पुजीपति वर्ग का परतिनिधित्व करता हें तथा जिसको 1990 के बाद फासीवादी सामरज़्वाद का सरक्षण पार्प्त हें, गहरा व घातक मोका देना था । मुजे विश्वाश हें की आपने लेनिन द्वारा लिखित उधरनो में यह तो पढ़ा होगा के बुर्जवा वर्ग व उनकी पार्टियों के मध्य जब अंतेर्विर्ध गहरातें हो तब एक क्रांतिकारी पार्टी की कार्यनीति को इस पेमाने पर आँका जाता हें की उसने इन अंतेर्विरोधों को ओर कितना गहरा किया व उनका मेहनतकश व मजदूर वर्ग के पक्ष में पार्टी व उस वर्ग के अपने क्रांतिकारी लक्ष्य के पर्ती कितना आगे बढ़ाया ? क्या इस पेमाने पर ये लोग खरे उतरे?
आशंका हें कि जिस आंदोलन कि अगुवाई बाबा कर रहे थे, वह अब RSS व भाजपा के हाथ में चला जाए! बाबा पर इल्जाम रहा हें की वे RSS समर्थक हें व ''हिंदुवादी"हैं। RSS ने आंदोलन को खुला समर्थन भी दिया, यह भी सही हें की RSS के अनेक विचारकों से बाबा विचार विमर्श करतें रहें हैं, पर बाबा के हाथ में ही आंदोलन था। इस घटना के बाद भाजपा इसे स्वयं सड़कों पर ले आइएगो तथा इस हेतु बाबा समर्थन दे यह उसके लिए जरूरी भी नहीं।कांग्रेस के नेतावों ने बाबा को ठग कहा पर भारत की जनता बाबा के मार्फत ही सही यह पुछना चाहती हें की तुम कितने सालों से महाठगी करते आ रहे हो क्या तुम्हारा इक विकल्प ठग हो सकता हैं? क्यों डर रहे हो !बाबा की योग की विचारधारा, कि आम आदमी के लिए योग जरूरी हैं, इस पर लोगों में मतभेद हो सकतें, जेसै मेरे जेसा इंसान इसे 'मध्यम वर्ग' के लिए 'जिम' जैसा मानता हें। जो गेर उत्पादक हैं। इक व्यक्ति के घर के पास कचरा पड़ा रहता हें, पास में खाली पड़े प्लाट में पानी सड़ रहा हो, उसे अपने पुरषार्थ व क्षर्म से साफ करने की इच्छा नहीं, पर योग, क्योंकि ''सभ्य" लोग कर रह हें, मुजे भी करना हें। यह बीमारी दूर करता हैं।
यह जरूर कहना चाहिए कि बाबा ने जो बहुत सारे मूढ़े उठाए वे पहले भी उठते तो रहते हें मगर बाबा नें भारत में जनजागरण कर जिस तरह का माहोल इस पर बनाया व जनता को साथ लेकर आंदोलित किया,शायद इससे पहले काले धन व भषटर्चार के साथ इतनी जनता नहीं आयी थी।इस पर सरकार ने कहा कि बाबा योग के साथ राजनीति क्यों सीखा रहें हैं, यह ठोग हें। योग इतना अच्छा जरूर हे कि वह राजनीति के साथ सोभा नहीं देता, पर क्या इसे सरकार तय करेगी?
गूजर आंदोलन के दोरन सरकार को चोतरफा गुजारोने ने घेरा अरबों रुपयों का नुकसान पहुंचाया तब क्या सरकार सो रही थी ? तथा वह अनशन के कुछ घंटे बाद इतनी बर्बरता क्यों पर क्यों उतार आयी ? कहतें हे की सरकार सुरक्षा को लेकर आशंकित थी ? तर्क व वास्तविकताए अपनी जगह हैं ।

आन्दोलन-बाबा-अन्ना व क्रांतिकारी

 
आन्दोलन-बाबा-अन्ना व क्रांतिकारी 
आज के भारतीय राजनितिक परिदृश्य में लगभग सभी जगह पर करीब करीब सभी राष्ट्रीय राजनितिक पार्टियों से आम जनता, मध्यम वर्ग, किसान व मजदुर वर्ग का मोहभंग हो चूका हैं तो जो लोग व्यवस्था में व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन की बात करते हैं उनके लिये सबसे गंभीर संकट हैं. यह स्वरूप तथा परिघटना रातो रात भी इस रूप में नहीं प्रकट हुयी हैं. लगता हैं की ये 'क्रांतिकारी' देश व काल की वस्तुगत परिस्थितियों का सामयिक व प्रासंगिक परिवेश के अनुकूल विश्लेषण करने में असफल रहें हैं.
आज जब इस राजनितिक शून्यता को 'नए' बाबा रामदेव व अन्ना हजारे तथा इनके समर्थकों ने (चाहे किसी के सहयोग व सरंक्षण में ही सही ) एक नए तरह के आन्दोलन में बदल दिया हैं तब केवल यह 'क्रांतिकारी' तबका व उनके संगठन अब इसका फोरी तोर पर विश्लेषण कर रहें हैं. अब यही लोग इस अवस्था में भारतीय राजनीति के मौलिक अन्तर्विरोधो के रहते ना तो इस आन्दोलन को कोई नई दिशा दे सकते व ना ही अपनी कोई सार्थक भूमिका निभा सकते. विडंबना यह भी देखिये कि इन मुद्दों का केवल ये समर्थन ही कर सकते हैं और बस मूकदर्शक बने रहें ! यह इस बात का द्योतक हैं यह 'क्रांतिकारियों' वर्ग भारतीय समाज व राजनीति के मौलिक अन्तर्विरोधो को समजने में ना केवल असफल रहा बल्कि अपने राजनितिक लक्ष्य की भी सही दिशा नहीं पहचान पाया. शायद 'आजादी' के बाद देश व इन 'क्रांतिकारियों' के लिये यह सबसे कठिन समय हैं.
१.बाबा रामदेव एक समय में बायसकल पर बैठकर च्यवनप्राश बेचते थे तथा इस व्यवस्था की अनेक कठिनाई के दौर से गुजरते हुवे लगभग ८ या ९ वर्ष पहले स्थापित हुवे थे. इनकी कई गलतियों रही होगी व कठिनाई भी पर इन 'क्रांतिकारियों' को उनकी दवाइयों में 'मानव' हड्डियां तो दिख गई मगर सेकडों रूपये की पश्चिम कि दवा जब भारत में लाखों रूपये में एक षडयंत्र के द्वारा बेचीं जाती हैं तो नहीं दिखती !
मुख्य बात जिसे में इस पोस्ट के मध्यम से उठाना चाहता हूँ वह यह हैं कि बाबा व अन्ना जेसे कई लोग इस देश में ग्रासरूट पर इस समाज के विकेन्द्रित ढांचे में शानदार कार्य कर रहें हैं पर उनकी तरफ इन क्रन्तिकारी का ध्यान ही नहीं जाता या जानबूझ कर ऐसे लोगों को अनसुना कर दिया जाता हैं. रामदेव जेसे व्यक्तियों का ज्ञान व ध्यान 'क्रांतिकारियों' को पिछड़ा लगता हैं. इससे यह बात प्रमाणित होती हें कि यह क्रन्तिकारी वर्ग भारतीय समाज, परिवेश, ज्ञान, विचार आदि के प्रति पूर्वाग्रह रखता हैं. अगर नहीं तो अन्ना व बाबा जेसे कई लोग इन ''जनसेवको'' के साथ होते ! अब ये लोग रोना रोते हैं की बाबा संघ का आदमी हैं. बाबा संघ के साथ हो या ना हो वे राजनीति के प्रति तटस्थ तो नहीं हैं रह सकते. बाबा तो फिर क्या इनका( क्रन्तिकारियों का) इंतजार करता की कब आये ये लोग व कब मुझे संबल मिले?
२. दुसरा उदहारण अन्ना अजारे का हैं. इस इंसान ने भी अपनी फौज की नौकरी के बाद ताउम्र जनता की सेवा की हैं. आज जिस मुकाम पर ये हैं अगर हम इस पर अधिक बात ना भी करे तो अन्ना जी लगभग २ वर्ष पहले तो राजनीति के हाशिए पर ही थे ! हाँ यह जरुर कहा जा जा सकता हैं की वे लगभग १५ वर्षों से पहले ही समाज में स्थापित हो चुके थे. भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक लामबंदी करने के लिये इन्हें कैसे व क्यों तलाशा गया व एक आन्दोलन का
नेतृत्व प्रदान किया गया इन सब बातों कि पृष्ठभूमि  पर यह पोस्ट नहीं लिखी जा रही हैं. हम कहना यही चाहते हैं की भारत के समाज में अनेक लोग विभिन्न क्षेत्रो में जबरदस्त ईमानदारी से कार्य कर रहें हैं तथा यही लोग समाज, जनता व सरकारों से अपने कार्य का लोहा भी मनवाते हैं. इनमे से अधिकंश के नहीं तो कइयों के नाम तारीफे के काबिल होते हैं. सवाल यह पैदा होता हैं कि आखिर भारत का वह वर्ग जो परिवर्तन व क्रन्तिकारी बदलाव कि बात करता हैं उसकि नजरों में आखिर ऐसे लोग ध्यान में क्यों नहीं आते ? इनसे संपर्क क्यों नहीं साधा जाता? आखिर परिवर्तनकारी व क्रन्तिकारी वर्ग समाज के मूल सरोकारों का देश व काल कि पृष्टभूमि में आंकलन क्यों नहीं करते हैं?
अतः यह वर्ग समाज कि मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाता जिसके परिणामस्वरूप इन आंदोलनों से या द्वारा अपने आप को हाशिए पर धकेल दिया हुवा पाता हैं.
हमारा कहना हैं की ये क्रांतिकारी आखिर इन्हें (जमीन से जुड़े सामाजिक व राजनैतिक (व्यक्ति ) क्यों नहीं देख पाते? आखिर इन्होने सत्य को देखने का कौनसा चश्मा पहन रखा हैं?
हें क्रांतिकारियों ! समय ना तो किसी को माफ़ करता व ना ही किसी से रुकता ! यह प्रकृति का सत्य हैं.