प्रणब मुखर्जी : लोकतंत्र को कमजोर कर आपातकाल जैसे हालात पैदा कर रहें है !
प्रणब मुखर्जी ने कहा कि कुछ लोग लोकतंत्र को कमजोर कर आपातकाल जैसे हालात पैदा कर रहें हें !इसे कौन इंकार कर रहा हें की देश में आपातकाल जैसे हालत नहीं बन रहें हें प्रणब दा ! 2 महीने पहले तो नहीं कह रहे थे आप। इस दौरान हालात किसने पैदा किए व क्यों पैदा हुवे । यह आप जनता को संबोधित करते हुवे कह रहें हो ! आड़ किसकी ले रहें हो ! Civil Society व रामदेव की । Civil Society तो दो महेने पहले भी तो थी, अब क्या हो गया ? जो नहीं थी वो हें Drafting Committee। किसने बनाई? जनता ने तो चुनी नहीं थी ? क्या संसद खत्म हो गयी थी जो इनको जनता का प्रतिनिधि माना आपने ? यह गैर संवैधानिक हें, इसे आप भी जानते हो व अन्ना तथा उनकी Drafting Committee ! भूषण जी तो 100% जानतें हें पर उनको तो मरते दम तक राजनीति करनी हें। भला इस Glamorous की दुनिया में उनको पुनरुदय हुवा हें वह किसी पार्टी में तो असंभव था। आज देखो हर दिन अन्ना, केजरीवाल, अग्निवेश, भूषण, रविशंकर, रामदेव, हेगड़े, कई बाबा, मोलवी, पादरी TV पर छाए हुवे हें। जनता के पर्वक्ता हें व विपक्ष की राजनीति कर रहें हें ! इनको इस स्तर तक किसने पंहुंचाया ? क्या जनता ने चुन कर भेजा या विपक्ष ने अधिकर्त किया ? नहीं ! तो अचानक ये देवता के रूप में कैसे प्रकट हो गए ! जीवित तो पहले भी थे । इनको सुनने के लिए छोटे हाल भी खाली पड़े रहतें होंगे सिवाय प्रवचनों के ।कन्हा हें विपक्ष ! यह तो माना जा सकता हें की वह बिल्कुल कमजोर पड़ गया, पर उनको खत्म करने के कगार पर किसने पहुंचाया ? यह सब कांगेस की सोची समजी राजनीति कि रणनीति कि योजना व कार्यनीति की परिनीति हें । अब तो पोल भी खोल दी 30.6.11 से पहले ही डिग्गी ने । हम लोग जानतें हें की Drafting Committee तुमने यह सब समजते हुवे की असंवैधानिक हें क्यों बनाई! क्योकि तूमे एक विपक्ष के खिलाफ संसद के बाहर दबाव समूह बनाना था की PM व न्यायपालिका लोकपाल के दायरे में हों, अगर विपक्ष विरोध करेगा तो ऊपर से यह तूरा की हम तो भष्ट्राचार के विरुद्ध सब करने को तैयार हें जेसा Civil Society व Drafting Committee ने कहा । अब विपक्ष कन्हा जाएगा ? Civil Society व Drafting Committee भस्माशूर बन जाय तो कह दे की अब आपातकाल के हालत बन रहें हें! यह तो सब जनता के मध्यम वर्ग, कांग्रेस तथा मीडिया का खेल हें । अन्य जनता व विपक्ष हासिए पर हें !
Civil Society व Drafting Committee मात्र एक कांग्रेस द्वारा खड़ा किया गया नकली विपक्ष हें ! ये लोग PM व CJI को लोकपाल के दायरे मे लेने का कांग्रेसी अभियान चला रहे हें ताकि पीएम, मंत्री व सांसद सभी संसद में इस मुधे की बहस का केंद्र ही न रहे व CJI मात्र सरकार की कठपुतली बन जाए । लोकपाल अनुसंधान, अभियोजन व सज्जा देने के लिए अधिकारित होगी । उसके फेसलों के खिलाफ न्यायपालिका हें ? उच्चतम न्यायालय के उपर तो सविधान में कोई प्रावधान भी नहीं हें व न ही एसा सर्वा सताधिकार लोकपाल देश के लिए हितकारी हें !
पहला पहलू: संसद में फिर किसी घोटाले की बहस हो सकेगी क्या ? जरा सोचो ! सांसद, मंत्री व पीएम अपने खिलाफ लगने वाले आरोपों पर कहेंगे की इस मुधे पर अभी कोई बात नहीं हो सकती क्योकि मामला लोकपाल के अधीन विचाराधीन हें, लोकपाल का फेसला आते ही कहेंगे न्याय के दरवाजे अभी खुले हें अभी उच्च या उच्चतम न्यायालय में मामला जाएगा, उसके बाद में ही इस बारे में कुछ कहा जा सकता हें की अमुख आरोपी दोषी हें। पूरा संसदीय जनतंत्र लोकपाल व अदालती प्रक्रिया की भेंट चठ जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में संसद गोण हो जाएगी ( जेसी भी संसद बनाई हें, वह इसी लोक्तांतत्रिक प्रक्रिया से चुन कर आयी हें ) जो की जनता की सर्वोच अदालत हें, वंहा पर ही पता चलता हें की कोण क्या कर रहा हें व उसी आधार पर जनता अपने प्रतिनिधियों का बाद में फैसला करती हें, बाद में चुनाव आने पर पुनः अपना फेसला सुनाती हें ।
दूसरा पहलू: यह ओर भी भयावह इसलिए हे की इससे संसदीय लोकतंत्र, न्यायपालिका, मीडिया वह समस्त जनता सच्चाई से महरूम हो जाएगी हें. जरा उसे भी देखें। हम सभी जानते हें की मीडिया पूँजीपतियों का हें व उनका आपसी अंतर्विरोध भी हें । मीडिया में प्रतिएक मामले को उजागर करने की होड लगी रहती हें, क्योंकि यह राजनीतिक बहस व संसद की बहस का केंद्र बन जाता हें। मीडिया की एसी खबरों को सुनने में जनता की उत्सुकता भी रहती हें क्योंकि वह बहस का केंद्र होगी तो इन खबरों से उनकी TRP रेट बढ़ती हें व उन्हें विज्ञापन कंपनियों से पेसा खूब मिलता हें । इसी आपसी प्रतिस्पर्धा से एक हद तक कुछेक हल्कों में पारदर्शिता बनी रहती हें, अगर कोई एक खबर दबाने कोशिश करता हें तो दूसरे के बाजी मार लेने की आशंका रहती । इस खेल में भी ब्लेकमेल व पेड़ नीव्ज का तो रोल फिर भी रहता ही हें । अब सोचो अगर कोई मालला लोकपाल में ही जाना हें तो किसको पड़ी हें की इन खबरों को देने की फ़िक्र करे ! कोन उछालेगे खबरों को अखबारों में, क्या होना हें जब यह राजनीति का मुधा ही नहीं रहेगी व न ही संसद व विधानसभा में बहस होगी । यह तो लंबी अदालती व उबाव कार्यवाही हुवी । मीडिया फिर भी अपनी जगह काम करेगा, फिर मीडिया क्या करेगा? हमें शायद कहने व ईसारे की भी जरूरुत नहीं हें ! इसे इसलिए भी महत्वपुरण माना जाता जा सकता हें की जब इस खबर व घोटाले का पर्दाफास होने से किसी राजनीतिक व्यक्ति पर कोई आंच आने वाली हें नहीं. इससे उसकी पार्टी की जनता में साख कितनी गिरनी हें उससे भी कोई मतलब नहीं। बस मीडिया का खबरों के पीछे मुख्य उद्धेस्य राजनीति पर बहस होने से हें जिसे जनता देखना पसंद करती हें वह होना नहीं.
हमे याद हें की संसद की सार्थकता के चलते ही हाल CWG,2 G Spectrum, AS Scandal जेसे अनेक घोटालों का पर्दाफास मीडिया ने किया था. इस पूरी सक्रियता के पीछे तो लोक्तांतत्रिक प्रक्रिया ही थी जिससे मीडिया ने इनका पर्दाफास किया.अन्यथा क्या होने वाल था ! मीडिया व लोकतान्त्रिक पार्टियों की सक्रियता से ही इन हाल के घोटालों का पर्दाफास हुवा व सरकार पर नियंत्रण करने मे न्यायपालिका ने बाद में मुख्य भूमिका निभाई।
सरकार चाहती हें की लोकपाल के माध्यम से न्यायपालिका पर नियंत्रण करने मे आसानी रहेगी व कोई परकर्ण अगर उछलता हे तो न्यायपालिका की हिम्मत ही नहीं होगी की उसे स्वन्त्र्त रह के फेसला दे क्योंकि पीएम व उनका मंत्रालय अप्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका को धमकाएगा की आपके खिलाफ मामला लोकपाल में जा सकता हें क्योंकि लोकपाल को आखिर चुनेगी तो सरकार ! हम यह सोच भी नहीं सकते की राष्ट्रपति व पीएम के बगेर सहमति कोई लोकपाल बन जाय जो सरकार के विरुद्ध हों या स्वतंत्र हों !
कोन किसका मददगार : क्या अन्ना हज़ारे व Civil Society व Drafting Committee के इस अभियान के बाद विपक्ष की संसद मे हिम्मत होगी की PM व CJI को लोकपाल से बाहर रखे ? शायद नहीं, क्योंकि भाजपा तो अन्ना व रामदेव को अपना नेता मान चुकी हें ! बाकी विपक्ष कि राजनीति के इस शतरंज में क्या बिसात ! हम जनतें हें कि यह पूरी शतांज की बिशात कांग्रेस ने ही बिछाई हें व Civil Society व Drafting Committee इनका मुख्य मोहरा !
प्रण्ब्दा कहते हें कि Civil Society व Drafting Committee व Baba Ramdev के आंदोलन लोकतंत्र को कमजोर कर रहें हें, तो इसे जनता सब जानती हें की इसके सबसे बड़े दोषी तो कांग्रेसी ही हें व ज्यादा दूर जाने की भी जरूरत नहीं पिछले 2 वर्ष का कार्यकाल का आखिरी अंकलन वे स्वयं अपनी आत्मा से कर ले, रही बात इन लोगों की तो इनको तो अपने ही आगे करके पलग पवारे पीछाए हें ! भुगतना तो जनता को हें. अगर पूरा विपक्ष भी सहमत हो जाता हे इस प्रस्ताव पर तो समजो लोकतंत्र संस्थानों को खत्म करने की बात तो प्रण्ब्दा कि बहुत ही छोटी हें, यह मानो कि लोकतंत्र को खत्म करने कि आख़िरी कील ठोकी जा चुकी हें ! कांग्रेस की आग से खेलने की पुरानी आदत हें व खेल खेल में कोई उसके लिए भस्माशूर भी पेदा हो सकता हें वेसे हर बार हो एसी आशंका नहीं हें, क्योंकि कांग्रेस अब इस खेल मे सबसे अनुभवी हें !